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- dhairyatravelsraip
- 25 जून 2019
- 3 मिनट पठन
भारत के ईतिहास के बारे में सबसे बड़ा झूठ ऐसा है कि मै लिख तो रहा हूँ, लेकिन इस आशंका के साथ कि लोग मुझे गालीयां देगे। सत्य बोलने से अगर गालीयां खानी पडे तो मै तैयार हूँ। अंग्रेजो ने और ऊनके भारत वासी चमचो ने एक ऐसा झूठ फैला रख्खा है कि हम उसे ही सच मानते हैं। वह झूठ यह है कि भारत के हिन्दू धर्म के अंतर्गत जो चातुर्वर्ण्य व्यवस्था और जाति व्यवस्था थी वह बिलकूल खराब थी, अत्याचारी व्यवस्था थी। वैसे तो आज भी यह व्यवस्था है लेकिन सिर्फ औपचारिक रूप में। भारत में अंग्रेज राज से पहले जो जाति की समाज रचना थी वह आज की व्यवस्था से सर्वथा अलग थी। वह व्यवस्था शुद्रो के लिए अन्याय कारक तो थी लेकिन ईतनी भी नहीं जितनी अंग्रेज व ऊनके प्रशंसकों द्वारा प्रचारित कि गई। अंग्रेजो द्वारा ऐसा प्रचारित करणा उनके ‘फोड़ो और राज करो’ नीति का एक अंग था। ईस नीति के अंतर्गत और जो झूठ फैलाये गये वह थे ‘आर्य भारत में बाहर से आये’ और ‘आर्य-द्रविड संघर्ष’।
अंग्रेज, पोर्तुगीज, स्पैनिश, फ्रेंच आदी युरोपीय लोगों ने अमरिकी महाद्वीप के मुल निवासियों पर जो जुल्म ढाये, अत्याचार कीये उसके जैसी कोई एक घटना भी कहीं घटी है भारत के अंग्रेज पुर्व भारत में? युरोपीय लोगों के आगमन से पहले अमेरिका महाद्वीप में प्लेग का अस्तित्व नहीं था, मतलब वहां के मुल निवासी, जिन्हे रेड ईंडीयन्स कहा जाता था, उनमें प्लेग के प्रति रोग प्रतिरोधक शक्ति (immunity)नहीं थी। तो, युरोपीय लेाग ,प्लेग के मरीज द्वारा उपयोग में लाई ैैैैैैैैैैैैैैैैैैैैैैैैैैैैैैैैैैैैैैैैैैैैैैैैैैैैैैैैैैैैैैैैैैैैैैैैैैैैैैैैैैैैैैैैैैैैैैैैैैैैैैैैैैैैैैैैैैैैैैैैैैैैैैैै
गई चादर, ब्लैंकेट रेड ईंडीयन्स की बस्तीयों मे डाल देते थे, जिस वजह से पुरी बस्ती प्लेग पीड़ित हो कर मर जाया करती थी। किस बात की सजा दी जाती थी बेचारे रेड ईंडीयन्स को? केवल एक बात की- कि वे अपने पुराने रीति रिवाजों को छोड़कर ख्रिस्ती बनने को नकार दिया करते थे। ईन जुल्मो के जैसी कोई एक घटना बताईये, जो भारत के अंग्रेज राज पुर्व के ईतिहास में घटीत हुई हो, जिसमें ऊच्च वर्ण के हींदूओं द्वारा अपने शूद्र बंधुओं पर जुल्म ढाये गये हो! आज अमेरिका महाद्वीप में अफ्रीकी मूल के लोगों की संख्या क्यों है?क्यों कि वे सब गोरों द्वारा अफ्रीका से पकड कर ले जाये गये गुलामों के वंशज है। आज मवेशियों को भी जैसे हालात में रखना कानूनन प्रतिबंधित है, ऊससे भी बदतर हालात में जहाजों में लादकर ले जाया करते थे। ऊनको आदमी नहीं, जानवर समझ कर काम कराया जाता था। और ऐसे क्रूर लोग हमें समझा रहे थे कि सभ्यता कैसी होती है! जादा दुखद बात यह कि अपने आप को बुद्धिमान समझने वाले हिंदूस्तानी, जो अंग्रेज कहते ,वह सब सच समझते थे।
यहां मैं वर्ण अथवा जाति व्यवस्था का समर्थन नहीं कर रहा हूँ, ना ही हमारे पुर्वजो द्वारा वर्ण और जाति व्यवस्था के कारण जो अपराध हुएं हो सकते हैं उनका समर्थन कर रहा हूँ। गोरों द्वारा किये गये जुल्मो का कथन केवल ईस लिए कीया है कि लगभग आधी दुनिया के लोगों को अपना गुलाम बनाए हुए अंग्रेज हमें धर्म, सभ्यता सिखा रहे थे, हमारे में फूट के बिज बो रहे थे, और हम आज तक ऊसके बाहर नहीं निकल सके। जाति व्यवस्था में सब बुराईयां ही थी ऐसा तो नहीं है। कुछ फायदे भी थे ईस व्यवस्था के।
समाज के हर वर्ग के लिए, हरएक जाति के लिए, एक विशिष्ट रोजगार आरक्षित था। ऊदाहरन के लिए – मिट्टी के बर्तन आदि बनाकर बेचना सिर्फ कुंम्हार (Potter) जाति का काम था। मतलब यह कि एक तरह से यह काम कुंम्हार जाति के लिए आरक्षित था। ऐसी कई जातियां थी।
सभी गांव लगभग स्वयंपूर्ण थे। प्रत्येक गांव मे सभी तरह के काम करने वाले मौजूद हूवा करते थे, जैसे लोहार, सुतार, कुम्हार, न्हाई, ईत्यादि। ईन्हे महाराष्ट्र में ‘बारा बलुतेदार’ कहते थे। बारा बलुतेदारों का बहूत मान, सन्मान कीया जाता था, ऊनके चरितार्थ की व्यवस्था गाँव मे ही होती थी। प्रचलित धारणा के विपरीत, समाज में बहुत सौहार्द रहता था।
पीढ़ी दर पीढ़ी एक ही काम करते रहने के कारण बच्चे बचपन में ही वह काम सिखते थे जो उन्हें आगे चलकर करना होता था। ईसके चलते हर कोई अपने काम में कुषल होता था।
एक जाति के सभी लोगों का व्यवसाय एक ही होनेके कारण उस जाति के तमाम लोगों का अर्थीक और सामाजिक स्तर लगभग समान होता था। ईस कारण से रोटी-बेटी व्यवहार आसानी से हो जाया करते थे। ( ईस बात का महत्व केवल वह मॉ बाप जान सकते हैं जिनको अपने संतान के लिए एक सुयोग्य जिवन साथी खोजने का कर्तव्य निभाना है, और यह कीतना कठिन है।
कुल मिलाकर हम कह सकते हैं कि जाति और वर्ण व्यवस्था में खामियां तो थी, लेकिन वह ऊतनी बुरी भी नहीं थी जितनी हमें पढाया गया कि थी। वर्तमान में जाति व्यवस्था कालब्रह्म हो चुकी है, उसका जल्द से जल्द निर्मुलन करने की दीशा में प्रयास करना चाहिए।
वंदे मातरम।




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